आयुर्विज्ञान से सम्बन्धित वांग्मय में दक्षता प्राप्त होगी

  •  प्राचीन भारत के आयुर्वेदीय स्वरूप का ज्ञान होगा। 
  • आयुर्विज्ञान के अध्ययनार्थ नवीन दृष्टिकोण उत्पन्न होगा।
  •  ऋग्वेद अथर्वेद आयुर्वेद एवं आयुर्विज्ञान से सम्बंधित अन्य अनेक दुर्लभ ग्रन्थों में वर्णित स्वास्थ्य से सम्बन्धित सूत्रों की उपयोगिता सिद्ध होगी।
  • वैदिक आयुर्विज्ञान में आयुर्वेदीय शोध के नवीन आयाम विकसित होंगे।

परिभाषिक पद

  • + आयुर्वेद- जो आयु का ज्ञान कराता है वह आयुर्वेद है।
  • आयुर्विज्ञान जो आयु एवं स्वास्थ्य से सम्बन्धित विज्ञान के विषय में विस्तार से विज्ञानात्मक विधि से वर्णन करे।
  • भिषक चिकित्सक वैद्य डॉक्टर अश्विनी दो यचगल देवता जो वेदों में आघ्य चिकित्सक कहे गये हैं।
  • धन्वन्तरि पृथ्वी पर आयुर्वेद के प्रणीता विष्णु के अंश शल्य चिकित्सा प्रधान सम्प्रदाय से सम्बन्धित हैं।
  • सुश्रुत पृथ्वी पर शल्यक्रिया के प्रणेता व महान आयुर्वेदज्ञ राइनोप्लास्टी नाक की शल्यक्रिया के दाता) चरक एक महान आयुर्वेदज्ञ अग्निवेशतन्त्र के प्रतिसंस्कर्ता। इनके प्रति-संस्कार के बाद अग्निवेश तन्त्रको परक संहिता कहा जाने लगा।
प्रभृति – जैसे

तंत्रकर्ता- तंत्र के रचयिता

  • संस्कर्ता किसी वस्तु , व्यक्ति का संस्कार करने वाले 
  • प्रतिसंस्कर्ता- तंत्र को पुनः संवर्धित एवं संशोधित करने वाले
  • अलौकिक- दैवीय
  • बृहत्रयी – सुश्रुत संहिता, चरक संहिता, अष्टड्गह्दय
  • लघुत्रयी- माधवनिदान शारंगधर एवं भाव प्रकाश
परिचय-

आयुर्वेद के सम्पूर्ण इतिहास का ज्योतिपुञ्ज सर्वप्रथम वेदों में दृष्टिगोचर होता है। वेदों में सभी प्रकार का ज्ञान और विज्ञान निहित है ग्वेद में आयुर्वेद के महत्वपूर्ण तथ्यों का यथास्थान विवेचन प्राप्त होता है। वैसे तो सामवेद एवं यजुर्वेद में भी आयुर्वेद विषयक सामग्री प्राप्त होती है किन्तु आयुर्वेद की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ अथर्ववेद है। इसमें आयुर्वेद के प्रायः सभी अंगों उपांगों का विस्तृत वर्णन मिलता है। अथर्ववेद आयुर्विज्ञान का मूल आधार है प्रस्तुत पाठ में आयुर्विज्ञान के उद्भव एवं विकास के सतत क्रम में एवं विभिन्न सोपान को सरल दृष्टिकोण से समझाया जाएगा |

मूल पाठ

विश्व संस्कृति के आधार स्तम्भ वेद हैं। वेदों में ज्ञान और विज्ञान का अनन्त भण्डार विद्यमान है अतः मनु ने कहा है- ‘सर्वज्ञानमयो हि सः” अर्थात् बेदों में सभी प्रकार का ज्ञान एवं विज्ञान निहित है। ऋक् गजु, साम और अथर्व इन चारों वेदों के अनुशीलन में ज्ञात होता है कि अथर्ववेद को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए उसे ब्रह्मवेद की संज्ञा दी गयी है, और कहा गया है जो ब्रह्मवेद में उपनीत है वह सब वेदों में उपनीत है एवं जो इसमें उपनीत नहीं है वह सभी में अनुपनीत है।

 

ऋग्वेद में आयुर्वेद के महत्त्वपूर्ण तथ्यों का यथास्थान विवेचन प्राप्त होता है। इसमें आयुर्वेद का उद्देश्य कुशल वैद्य, वैद्य के गुण-कर्म, विविध ओषधियाँ, उनके लाभ आदि मानव शरीर के विभिन्न अङ्ग, विविध चिकित्सायें आदि का विशिष्ट वर्णन प्राप्त होता है। आयुर्वेद वस्तुतः ऋग्वेद का उपवेद है और वेद आयुर्वेद की दृष्टि से ऋग्वेद व अथर्ववेद अत्यन्त महनीय अन्य है। इसमें आयुर्वेद के प्रायः सभी अंगों उपान्नों का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। अथर्ववेद आयुर्वेद का मूल आधार है, इसे भृग्वङ्गिरस तथा अथर्वाङ्गिरस भी कहा जाता है।

महर्षि सुश्रुत एवं चरक ने आयुर्वेद का लक्षण एवं उसके उद्देश्य पर विस्तार से प्रकाश डाला है। चरक का कथन है – ‘आयुर्वेदयति इति आयुर्वेदः” अर्थात् जो आयु का ज्ञान कराता है वह आयुर्वेद है और अधिक स्पष्ट करते हुए चरक कहते है कि आयुर्वेद ही मनुष्य की आयु, सुख-दुःख, हित, अहित, पथ्य अपथ्य, ग्राह्य अग्राह्य आदि कारणों का वर्णन करता है, आयुर्वेद ही द्रव्यों, गुणों व कर्मों का ज्ञान कराता है।” महर्षि सुश्रुत का कथन है कि जिसमें आयु के हितकर और अहितकर तत्वों का भलीभाँति विचार हो और जो दीर्घ आयु प्राप्त कराता है, वह आयुर्वेद है। महर्षि चरक ने आयुर्वेद को शाश्वत कहा है क्योंकि जबसे ‘आयु’ (जीवन) का प्रारम्भ हुआ और जब से जीव को ज्ञान हुआ तभी से आयुर्वेद की सत्ता प्रारम्भ होती है।” सुश्रुत ने तो यहाँ तक कहा है कि ब्रह्मा ने सृष्टि उत्पत्ति से पूर्व ही आयुर्वेद की रचना की जिससे प्रजा उत्पन्न होने पर उसका उपयोग कर सके। सभी संहिताकारों ने भी ब्रह्मा से आयुर्वेद का प्रादुर्भाव बताया है। अतः इससे आयुर्वेद का शाश्वतत्व स्वतः सिद्ध होता है।

आयुर्वेद ही वस्तुतः आयुर्विज्ञान है, जिसके संकेत ऋग्वेद में बृहद् रूप में मिलते हैं ऋग्वेद में अनेकों सूक्तों व मन्त्रों के द्वारा आयुर्विज्ञान एवं चिकित्सा शास्त्र को स्पष्ट किया गया है।” अश्विनी को देव भिषक व आद्य चिकित्सक के रूप में ऋग्वेद में स्थापित किया गया है जिससे यह स्पष्ट होता है कि ऋग्वैदिक काल से ही आयुर्विज्ञान स्थापित था इसे और अधिक विस्तार ऋग्वेद के उपवेद आयुर्वेद से प्राप्त हुआ। ऋग्वैदिक काल से प्रारम्भ हुई आयुर्विज्ञान की यह परम्परा उत्तरोत्तर और अधिक विस्तार को प्राप्त करती हुई समृद्ध होती गयी।

महर्षि चरक के कथनानुसार ब्रह्मा से आयुर्वेद का ज्ञान दक्ष प्रजापति ने प्राप्त किया। दक्ष प्रजापति से से यह ज्ञान अश्विनी कुमारों ने और उनसे इन्द्र ने इसे ग्रहण किया। इस परम्परा को निम्नाकित चार्ट के द्वारा सरलता से समझा जा सकता है

आयुर्वेद का अवतरण

ब्रह्मा से आयुर्वेद के प्रादुर्भाव का आख्यान वस्तुतः यह सङ्केत करता है कि आयुर्वेद सृष्टि के आदि काल से ही विद्यमान है। दक्ष प्रजापति, अश्विनी कुमार तथा देवलोकीय इन्द्र से होता हुआ यह अलौकिक (दैवीय) ज्ञान अत्रि व धन्वन्तरि प्रभृति महान ऋषियों द्वारा होता हुआ शिष्य परम्परा से इस भूमण्डल पर प्रसारित हुआ। आयुर्वेद की उपचार पद्धति को वस्तुतः दो भागों में विभाजित किया गया है। एक शल्यतन्त्र अर्थात् शल्य क्रिया पद्धति तथा दूसरा है कायतन्त्र अर्थात् काय चिकित्सा पद्धति जिसके अन्तर्गत 6 विभाग आते हैं। इस प्रकार आयुर्वेद के कुल अष्टाङ्ग विभाग हैं।

सुश्रुत संहिता में भी आयुर्वेदावतरण का चरकोक्त क्रम ही वर्णित है केवल आत्रेय के स्थान पर धन्वन्तरि का नाम आया है। इन्द्र से धन्वन्तरि ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करके अपने शिष्यों (सुश्रुतादि) को शिक्षित किया।

वेदों के संहिता भाग तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में धन्वन्तरि का उल्लेख न होकर महाभारत तथा पुराणों में मिलता है धन्वन्तरि को भगवान विष्णु का अंश माना जाता है, जो समुद्र मन्थन से निर्गत कलश से अण्डरूप में प्रादुर्भूत हुए और विष्णु ने उन्हें अण्ड से प्रादुर्भूत होने के कारण द्वितीय द्वापर में दूसरा जन्म लेने और अनेक सिद्धियाँ प्राप्त करने का वरदान दिया और कहा कि वे आयुर्वेद का अष्टाम विभाग भी करेंगे। इस वरदान के अनुसार पुत्रकाम काशिराज धन्व की तपस्या से सन्तुष्ट होकर भगवान अब्ज ने उनके पर पुत्र रूप से जन्म लिया और ‘धन्वन्तरि नाम को धारण किया।” धन्वन्तरि सभी रोगों के निवारण में कुशल थे। धन्वन्तरि ने महर्षि भरद्वाज से आयुर्वेद का ज्ञान ग्रहण करके उसे अष्टाङ्ग भाग में विभक्त किया है, जो निम्नवत है

  • शल्य चिकित्सा (Surgery)
  • शाला (Opthamology, Otology, Rhinology. Dentistry, Oropharyngology etc) 
  •  चिकित्सा (Medicine)
  •  (Toxicalogy, Medical Jurisprudence)
  •  भूनविद्या (Psychiatry Microbiology)
  • कीमाय (Paediatrics)
  •  रसायन (Science of Rejuvenation, Immunology)
  • (वाजीकरण (Science of Alphrodisiac)
भूलोक पर आयुर्वेद का अवतरण महर्षि भरद्वाज एवं धन्वन्तरि से ही माना जाता है। वैदिक काल में जो महत्त्व एवं स्थान अश्विनी को प्राप्त या पौराणिक काल में वही महत्त्व धन्वन्तरि को मिला। अश्विनी के हाथों में जीवन और ओज का प्रतीक मधुकलश या तो धन्वन्तरि के हाथों में अमृतकलश आया। विष्णु संसार की रक्षा करने वाले देवता है अतः रोगों की रक्षा करने वाले धन्वन्तरि विष्णु के अंश माने गये। देवता के रूप में धन्वन्तरि के पूजन का उल्लेख प्राचीन संहिताओं में भी मिलता है।” काशिराज दिवोदास भवन्तरि उपनिषद् कालीन हैं। इनका काल 1000-1500 ई० पू० है।
उपरोक्त वर्णन से स्पष्टतया ज्ञात होता है कि धन्वन्तरि केवल अष्टाङ्ग विभाग के रचयिता ही नहीं अपितु कुशल शल्यतन्वंश एवं सम्पूर्ण आयुर्विज्ञान के ज्ञाता थे। धन्वन्तरि विषविद्या में निपुण, अवशास्त्र एवं गजशास्त्र में निष्णात थे। आयुर्विज्ञान के अष्टाङ्ग विभाग के साथ-साथ प्रयक् शल्यतन्त्र का विस्तृत विकास एक विशिष्ट अंग के रूप में कालान्तर में हुआ। दिवोदास धन्वन्तरि के उपदेशों को सुश्रुत ने अपनी संहिता में विस्तार से निबर्द्ध किया है जो कि शल्यतन्त्र का उपजीव्य अन्य बना। सुश्रुत विश्वामित्र के पुत्र कहे गये हैं।” विश्वामित्र नामक अनेक आचार्य हुए उनमें से एक आचार्य का सम्बन्ध आयुर्वेद से है। बहुत सम्भव है कि इसी विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत हो। शालिहोत्र के पुत्र के रूप में भी सुश्रुत का उल्लेख मिलता है। सुश्रुत का गवायुर्वेद, अश्चायुर्वेद से भी सम्बन्ध बताया गया है।” सुश्रुत ने ही आद्य संहिता का उपबृंहण एवं प्रतिसंस्कार किया। मौलिक सिद्धान्त के क्षेत्र में सुश्रुत की महत्वपूर्ण देन है। रक्त के महत्व की ओर भी सुश्रुत ने ही ध्यानाकृष्ट किया है। स्वस्थ व्यक्ति का आदर्श लक्षण समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्याभिधीयते।”
 
ये सुश्रुत की ही देन है। शल्य तन्त्र का प्रमुख मन्य होने के कारण सुश्रुत में शरीर का वर्णन विस्तृत रूप में प्राप्त होता है। त्वचा और करना का विशद वर्णन सुश्रुत की सूक्ष्म दृष्टि का परिचारक है। प्रकृति का भी विस्तार से वर्णन है। अस्थियों की संख्या, प्रकार, सन्धि-स्नायु-वर्णन भी नवीन ढंग से किया गया है। मर्म का वर्णन अत्यन्त मौलिक है। इसे भी शल्य विषयार्द्ध कहा गया है। रक्त का शिराओं में संचरण तथा उसके वर्ण के अनुसार शिराओं का अरुणा, नीला और गौरी में विभाग भी नवीन मान्यता है। बोनि, गुदा गर्भाशय व वस्ति का विशद वर्णन है ‘नाभिस्थाः प्राणिनां प्राणाः अर्थात् नाभिने प्राणों की स्थिति मानी गयी है। वायु और जल शोधन की विधि भी सुश्रुत ने सविस्तार वर्णित की है। सुश्रुत का काल 2वीं शती है। 
सुश्रुत संहिता में सूत्रस्थान में 46 अध्याय, निदान स्थान में 16, शारीरस्थान में 10, चिकित्सालय में 40 तथा कल्पस्थान में 08 अध्याय है कुल 120 अध्याय है।” प्राचीन संहिताओं की व्यवस्था भी प्रायः इसी प्रकार थी। चरक संहिता में भी इतने ही अध्याय है। आयुर्विज्ञान का यह गूढ ज्ञान लोक में धन्वन्तरि से प्रारम्भ हुआ धन्वन्तरि दिवोदास ने शिष्य सुश्रुत के अतिरिक्त 6 अन्य शिष्यों को यह ज्ञान प्रदान किया औषधेनव, वैतरण, औरघ्र, पौष्कलावत, करवीर्य एवं गोपुरक्षित इसके अतिरिक्त धन्वन्तरि के अग्निवेश, वाग्भट्ट, शार्ङ्गधर, भावप्रकाश आदि शिष्यों का भी उल्लेख प्राप्त होता है। यही कारण है कि आयुर्वेद की बृहत्त्रयी में सुश्रुत संहिता, चरक संहिता तथा अष्टाङ्गहृदय की गणना होती है तथा लघुत्रयी में माधवनिदान, शार्ङ्गधर एवं भावप्रकाश को गिना जाता है। यह सभी अन्य धन्वन्तरि से ही सम्बन्ध रखते हैं। महर्षि चरक का स्थान सुश्रुत के पश्चात् आता है किन्तु वह धन्वन्तरि परम्परा के नहीं प्रतीत होते हैं।
 
वर्तमान काल में उपलब्ध चरक संहिता का यह रूप अनेकों परिवर्तनों के बाद प्राप्त हुआ है। इसमें भी सुश्रुत के ही समान सूत्रस्थान 36 अध्याय, निदान स्थान 16 अध्याय शारीरस्थान 10 अध्याय, चिकित्सालय 40 अध्याय तथा कल्पस्थान 8 अध्याय हैं। चरक के उत्तरतन्त्र में 66 अध्यायों को बाद में जोड़ा गया प्रतीत होता है संहिता के प्रारम्भ में आयुर्वेदावतरण का वर्णन है उसके अनुसार ब्रह्मा से प्रजापति→ अश्विनीकुमार इन्द्रराज ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया एवं आत्रेय पुनर्वसु ने पुनः यह ज्ञान अपने छः शिष्यों को हस्तान्तरित किया। ये छ: शिष्य क्रमशः अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण, पराशर, हारीत एवं क्षारपाणि हैं।
चरक संहिता का विस्तृत अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि चरक संहिता का सद्वृत्त धर्मसूत्रों पर आधारित है और चरक के काल में धन्वन्तरि देव रूप में पूजित थे अतः चरक का काल दिवोदास धन्वन्तरि के पश्चात् तथा पाणिनि और कनिष्क के बीच लगभग 200 वर्ष ईसा पूर्व विद्वत्जन मानते हैं। आयुर्वेद के आष्टाङ्ग विभाग के अतिरिक्त आयुर्वेदिक चिकित्सा के कई अन्य भाग भी विकसित हुए जैसे प्राकृतिक चिकित्सा क्योंकि प्रकृति मनुष्य के लिए वरदान है। प्रकृति के सभी तत्व पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र आदि किसी न किसी रूप में मनुष्य का हित करते हैं। इसी कारण से अनेकों प्रकार की प्राकृतिक चिकित्सा का विस्तार वर्तमान में हो गया है जिनमें प्रमुख है जल चिकित्सा, सूर्यकिरण चिकित्सा, वायु एवं प्राणायाम चिकित्सा अग्निचिकित्सा मृत्तिकाचिकित्सा यज्ञचिकित्सा, मानस या मनोवैज्ञानिक चिकित्सा, मन्त्रचिकित्सा, हस्तस्पर्शचिकित्सा एवं उपचार चिकित्सा।

सारांशिका

ऋग्वैदिक काल में इन समस्त प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियों का वर्णन आया है। वैदिक वाङ्मय में यज्ञ अथवा मंत्र चिकित्सा पद्धति के अनेकों मन्त्र उपलब्ध होते हैं। ॠग्वेद, अथर्ववेद एवं यजुर्वेद में मानस चिकित्सा के अनेकों मन्त्र प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद और अथर्ववेद में हस्तस्पर्श चिकित्सा के कई महत्त्वपूर्ण मन्त्र आये हैं। हृदयरोगों, पीलिया एवं विभिन्न प्रकार की पीड़ाओं में सूर्यकिरण चिकित्सा ऋग्वेद एवं अथर्ववेद में अति विस्तार से उपलब्ध होती है तथा साथ ही मणि, मन्त्र, औषध चिकित्सा से सम्बन्धित मन्त्र भी वहाँ प्राप्त होते हैं किन्तु दुर्भाग्यवश मध्य काल में इन चिकित्सा पद्धतियों का महत्त्व धूमिल होता चला गया और लोग इन पद्धतियों को विस्मृत करते चले गये। आज वर्तमान काल में पुनः ये चिकित्सा पद्धतियाँ जनमानस में अपना स्थान बना रही है और लोग इन्हें अपनाकर स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। वर्तमान में आयुर्वेदिक कालेज व विश्वविद्यालयों में प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्रों की अलग से स्थापना हो रही है, जिससे आयुर्विज्ञान का मानव जीवन में अधिकाधिक प्रयोग हो सके और जीवन को स्वस्थ, रोगमुक्त एवं दीर्घायु बनाया जा सके।

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